15.31 लाख की वसूली पर एचएसवीपी को झटका, उपभोक्ता आयोग ने प्लॉट धारक के पक्ष में सुनाया बड़ा फैसला !
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फरीदाबाद
( रिपोर्ट– अरुण शर्मा)
फरीदाबाद में एक प्लॉट धारक को जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन) से बड़ी राहत मिली है। आयोग ने हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) को सेक्टर-65 के प्लॉट मालिक सुमेश चुघ से वसूले गए 15.31 लाख रुपये ब्याज सहित वापस करने के आदेश दिए हैं। आयोग ने अपने फैसले में माना कि प्लॉट की श्रेणी को लेकर गलत जानकारी देकर अतिरिक्त राशि वसूलना सेवा में कमी (डिफिशिएंसी इन सर्विस) की श्रेणी में आता है।
मामले के अनुसार गुरुग्राम निवासी सुमेश चुघ को वर्ष 2007 में एचएसवीपी द्वारा फरीदाबाद के सेक्टर-65 में एक प्लॉट आवंटित किया गया था। वर्ष 2022 में जब उन्होंने अपने प्लॉट पर निर्माण कार्य शुरू करने की प्रक्रिया के लिए एचएसवीपी कार्यालय का रुख किया, तब अधिकारियों ने उन्हें बताया कि उनका प्लॉट प्रिफ्रेंशियल (पी) श्रेणी में आता है। इसी आधार पर उनसे 15.31 लाख रुपये अतिरिक्त शुल्क जमा कराने की मांग की गई, जिसे उन्होंने जमा भी कर दिया।
एचएसवीपी के अनुसार प्रिफ्रेंशियल श्रेणी के प्लॉट अपेक्षाकृत बेहतर लोकेशन पर स्थित होते हैं और उनके लिए अतिरिक्त प्रीमियम वसूला जाता है। हालांकि, सुमेश चुघ ने इस मांग को नियमों के विपरीत बताते हुए जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया और अतिरिक्त शुल्क की वसूली को चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान आयोग ने रिकॉर्ड और नीतिगत प्रावधानों का गहन परीक्षण किया। आयोग ने पाया कि प्रिफ्रेंशियल (पी) श्रेणी से संबंधित नीति वर्ष 2009 में लागू की गई थी, जबकि संबंधित प्लॉट का आवंटन वर्ष 2007 में हो चुका था। ऐसे में बाद में लागू हुई नीति के आधार पर प्लॉट धारक से अतिरिक्त शुल्क वसूलना नियमों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि एचएसवीपी द्वारा की गई यह वसूली अनुचित और नियम विरुद्ध है। इसके साथ ही प्राधिकरण को शिकायतकर्ता से वसूली गई 15.31 लाख रुपये की राशि निर्धारित ब्याज सहित लौटाने के निर्देश दिए गए हैं।
उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े जानकारों का मानना है कि यह फैसला सरकारी एजेंसियों द्वारा की जाने वाली मनमानी वसूली के खिलाफ एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित होगा। साथ ही यह निर्णय उन उपभोक्ताओं के लिए भी राहत का संदेश है, जो नीतियों की गलत व्याख्या या प्रशासनिक त्रुटियों के कारण आर्थिक बोझ झेलने को मजबूर होते हैं।
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